अब भगवान तक भी “रेट लिस्ट” लग गई है।

महाभिषेक — 11,500
रुद्राभिषेक — 7,500
दिन भर की पूजा — 51,000

आस्था अब स्लैब में बंट चुकी है।

अब भगवान तक भी “रेट लिस्ट” लग गई है।

महाभिषेक — 11,500
रुद्राभिषेक — 7,500
दिन भर की पूजा — 51,000

आस्था अब स्लैब में बंट चुकी है।

जिसके पास पैसा है
वो भगवान के “करीब” बैठ सकता है
जिसके पास नहीं है
वो लाइन में खड़ा रहेगा… दूर

मुद्दा पैसा नहीं है
मुद्दा ये है कि अब भक्ति भी “पैकेज” बन रही है

धर्म कभी अनुभव था
अब सेवा-उत्पाद बनता जा रहा है

जहाँ पहले श्रद्धा से दिया जाता था
अब शुल्क तय होता है

और सबसे खतरनाक बदलाव यही है—

जब मंदिर व्यवस्था चलाने के नाम पर
धीरे-धीरे बाज़ार की भाषा बोलने लगते हैं

तो भगवान नहीं बदलते
लेकिन भगवान तक पहुँच का रास्ता बदल जाता है

और वही रास्ता
समाज को भी बदल देता है

क्योंकि जिस दिन आस्था में भी
VIP और सामान्य का फर्क तय हो गया

उस दिन धर्म नहीं
सिस्टम पूजा जाने लगेगा

सोचिए—

क्या हम भगवान को पूज रहे हैं
या उस व्यवस्था को
जिसने भगवान तक पहुँच के भी दाम तय कर दिए हैं?

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