ट्रम्प बोले- जिनपिंग ताइवान पर हमले का अंजाम जानते हैं:हमारे पास दुनिया को 150 बार उड़ाने जितने परमाणु हथियार, फिर भी टेस्ट जरूरी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन को चेतावनी दी है कि अगर उसने ताइवान पर हमला किया, तो उसे गंभीर नतीजे भुगतने होंगे। ट्रम्प ने दावा किया कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग स्थिति को अच्छी तरह समझते हैं। ट्रम्प ने रविवार को CBS न्यूज को दिए इंटरव्यू में कहा, अगर ताइवान पर हमला हुआ तो वह (शी जिनपिंग) जानते हैं कि इसका जवाब क्या होगा। उन्होंने हमारी मुलाकात में इस पर बात नहीं की, क्योंकि वह नतीजे जानते हैं। ट्रम्प ने दावा किया है कि जिनपिंग ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि जब तक ट्रम्प राष्ट्रपति हैं, तब तक चीन ताइवान को अपने नियंत्रण में लेने की कोई सैन्य कार्रवाई नहीं करेगा। ट्रम्प ने यह भी कहा है कि अमेरिका को फिर से परमाणु परीक्षण शुरू करने की जरूरत है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका के पास इतने परमाणु हथियार हैं कि दुनिया को 150 बार नष्ट किया जा सकता है, लेकिन रूस और चीन की गतिविधियों के चलते टेस्ट करना जरूरी है। ट्रम्प परमाणु हथियारों की टेस्टिंग का आदेश दे चुके ट्रम्प ने रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) को परमाणु हथियारों की तुरंत टेस्टिंग शुरू करने का आदेश दिया है। उन्होंने कहा कि यह टेस्टिंग चीन और रूस के बराबर होनी चाहिए। दरअसल ट्रम्प का कहना है कि रूस और चीन भी गुप्त परीक्षण कर रहे हैं, बस दुनिया को पता नहीं चलता। अमेरिका ने आखिरी बार 23 सितंबर 1992 को परमाणु परीक्षण किया था। यह अमेरिका की 1,030वीं टेस्टिंग थी। टेस्टिंग रेनियर मेसा पहाड़ी के 2300 फीट नीचे नेवादा टेस्ट साइट पर की गई, ताकि रेडिएशन बाहर न फैले। इसका कोडनेम था- डिवाइडर। विस्फोट जमीन के नीचे इतनी जोर से हुआ कि नीचे की चट्टानें पिघल गई थीं। जमीन की सतह लगभग 1 फुट ऊपर उठकर फिर धंस गई। वहां अभी भी 150 मीटर चौड़ा और 10 मीटर गहरा गड्ढ़ा दिखाई देता है। अमेरिका और चीन के रक्षामंत्रियों ने ताइवान मुद्दे पर बात की अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने 31 अक्टूबर को मलेशिया में चीन के रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जुन से बातचीत की। उन्होंने ताइवान और साउथ चाइना सी में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अमेरिका इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखेगा और अपने हितों की रक्षा करेगा। हेगसेथ ने बताया कि अमेरिका टकराव नहीं चाहता, लेकिन अपनी सैन्य मौजूदगी मजबूत रखेगा। जवाब में चीन के रक्षा मंत्री डोंग जुन ने कहा कि अमेरिका को ताइवान के मामले में सावधानी से काम करना चाहिए और ताइवान की स्वतंत्रता के समर्थन से बचना चाहिए। चीन को ताइवान हमले की ट्रेनिंग दे रहा रूस ब्रिटिश डिफेंस थिंक टैंक रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज (RUSI) ने दावा किया है कि रूस ताइवान पर ‘एयरबोर्न अटैक’ के लिए चीनी पैराट्रूपर्स को टैंक, हथियार व तकनीक मुहैया करा रहा है। RUSI ने 800 पन्नों के लीक दस्तावेज के हवाले से यह खुलासा किया है। इन दस्तावेजों के मुताबिक, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपनी सेना पीएलए को 2027 तक ताइवान पर हमला करने के लिए तैयार रहने का आदेश दिया है। पीएलए के पैराट्रूपर्स को रूस में सिम्युलेटर और ट्रेनिंग इक्विपमेंट के जरिए ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके बाद चीन में एक साथ ट्रेनिंग होगी, जिसमें रूसी सेना उन्हें लैंडिंग, फायर कंट्रोल और मूवमेंट की ट्रेनिंग देगी। ताइवान को अपना हिस्सा मानता है चीन चीन ताइवान को अपना ही हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान खुद को एक स्वतंत्र देश मानता है। चीन और ताइवान के बीच ये झगड़ा 74 साल से चला आ रहा है। दरअसल, चीन के साथ ताइवान के बीच पहला कनेक्शन 1683 में हुआ था। तब ताइवान क्विंग राजवंश के अधीन हुआ था।अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ताइवान की भूमिका 1894-95 में पहले चीन- जापान युद्ध के दौरान सामने आई। जापान ने क्विंग राजवंश को हराकर ताइवान को अपना उपनिवेश बना लिया। इस पराजय के बाद चीन कई भागों में बिखर गया। कुछ साल बाद चीन के बड़े नेता सुन्-यात-त्सेन ने चीन को एकजुट करने के उद्देश्य से 1912 में कुओ मिंगतांग पार्टी बनाई। हालांकि उनका रिपब्लिक ऑफ चाइना का अभियान पूरी तरह सफल हो पाता उससे पहले ही 1925 में उनकी की मृत्यु हो गई। इसके बाद कुओ मिंगतांग पार्टी के दो टुकड़े हो गए। नेशनलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी। नेशनलिस्ट पार्टी जनता को ज्यादा से ज्यादा अधिकार देने के पक्ष में थी, जबकि कम्युनिस्ट पार्टी डिक्टेटरशिप में भरोसा रखती थी। इसी बात पर चीन के भीतर गृहयुद्ध शुरू हुआ। 1927 में दोनों पार्टियों के बीच नरसंहार की नौबत आ गई। शंघाई शहर में हजारों लोगों को मार गिराया गया। यह गृह युद्ध 1927 से 1950 तक चला। इसका फायदा जापान ने उठाया और चीन के बड़े शहर मंजूरिया पर कब्जा कर लिया। तब दोनों पार्टियों ने मिलकर जापान का मुकाबला किया और द्वितीय विश्व युद्ध (1945) में जापान से मंजूरिया को छुड़ाने में सफल रहा। कुछ दिन बाद जापान ने ताइवान पर भी अपना दावा छोड़ दिया। इसके बाद दोनों पार्टियों में फिर झगड़े शुरू हो गए। पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना और रिपब्लिक ऑफ चाइना यानी चीन और ताइवान। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी यानी माओ त्से तुंग का शासन था, जबकि ताइवान में नेशनलिस्ट कुओमितांग यानी चियांग काई शेक का शासन था। दोनों के बीच संपूर्ण चीन पर कब्जे के लिए जंग हुई। रूस की मदद से कम्युनिस्ट जीत गए और शेक को ताइवान में समेट दिया। यानी ताइवान तक सीमित कर दिया। दरअसल, ताइवान द्वीप पेइचिंग से दो हजार किमी दूर है। माओ की नजर फिर भी ताइवान पर रही और वे उसे चीन में मिलाने पर अड़े रहे। समय समय पर झगड़े होते रहे, लेकिन चीन कामयाब नहीं हो पाया क्योंकि, ताइवान के पीछे अमेरिका खड़ा हो गया। कोरिया वॉर को दौरान अमेरिका ने ताइवान को न्यूट्रल घोषित कर दिया।

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