रुपया रिकॉर्ड ऑल टाइम लो पर, विदेशी वस्तुएं महंगी होंगी:डॉलर के मुकाबले 27 पैसे गिरकर 91.96 पर पहुंचा, विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे

भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले ऑल टाइम लो पर पहुंच गया है। आरबीआई के मुताबिक, गुरुवार (29 जनवरी) को 1 डॉलर के मुकाबले रुपया 27 पैसा गिरकर 91.96 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ। विदेशी निवेशकों (FPI) की लगातार बिकवाली और वैश्विक स्तर पर बढ़ते व्यापारिक तनाव की वजह से रुपए में यह गिरावट देखी जा रही है। साल 2026 की शुरुआत से ही रुपया दबाव में है। पिछले साल दिसंबर 2025 में पहली बार रुपया 90 के स्तर के पार गया था। अब महज 29 दिन के भीतर यह 92 के स्तर के करीब आ गया है। मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नई टैरिफ नीतियों और ग्लोबल टेंशन के चलते दुनियाभर के निवेशक गोल्ड और डॉलर में निवेश बढ़ा रहे हैं।
रुपया की गिरावट के तीन बड़े कारण 1. विदेशी निवेशकों की बाजार से निकासी: विदेशी निवेशक (FPI) भारतीय शेयर बाजार से लगातार अपना पैसा निकाल रहे हैं। जनवरी 2026 के पहले 20 दिनों में ही उन्होंने ₹29,315 करोड़ की बिकवाली की है। जब ये निवेशक अपना पैसा वापस ले जाते हैं, तो वे रुपए के बदले डॉलर की मांग करते हैं। डॉलर की मांग बढ़ने से उसकी कीमत बढ़ जाती है और रुपया गिर जाता है। 2. ट्रम्प की टैरिफ नीतियां और वैश्विक तनाव: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की यूरोपीय देशों पर नया टैक्स (टैरिफ) लगाने की धमकी और ‘ग्रीनलैंड’ विवाद की वजह से दुनिया भर के बाजारों में अनिश्चितता का माहौल है। ऐसे डर के समय में निवेशक अपना पैसा भारत जैसे विकासशील देशों से निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर या सोने में लगाने लगते हैं, जिससे डॉलर और भी मजबूत हो रहा है। 3. मजबूत अमेरिकी इकोनॉमी और ऊंची ब्याज दरें: अमेरिका में बेरोजगारी की दर कम हुई है और वहां की अर्थव्यवस्था मजबूत दिख रही है। इस वजह से दुनिया भर के निवेशकों को लग रहा है कि अमेरिका में ब्याज दरें अभी ऊंची बनी रहेंगी। ज्यादा मुनाफे के लालच में निवेशक अपना पैसा अमेरिकी बैंकों और बॉन्ड्स में डाल रहे हैं, जिससे पूरी दुनिया में डॉलर की मजबूती बढ़ गई है। रुपए में गिरावट से इम्पोर्ट करना महंगा होगा रुपए में गिरावट का मतलब है कि भारत के लिए चीजों का इम्पोर्ट महंगा होना है। इसके अलावा विदेश में घूमना और पढ़ना भी महंगा हो गया है। मान लीजिए कि जब डॉलर के मुकाबले रुपए की वैल्यू 50 थी, तब अमेरिका में भारतीय छात्रों को 50 रुपए में 1 डॉलर मिल जाता था। अब 1 डॉलर के लिए छात्रों को 91 रुपए खर्च करने पड़ेंगे। इससे छात्रों के लिए फीस से लेकर रहना-खाना और अन्य चीजें महंगी हो जाएंगी। करेंसी की कीमत कैसे तय होती है? डॉलर की तुलना में किसी भी अन्य करेंसी की वैल्यू घटे तो उसे मुद्रा का गिरना, टूटना, कमजोर होना कहते हैं। अंग्रेजी में करेंसी डेप्रिसिएशन कहते हैं। हर देश के पास फॉरेन करेंसी रिजर्व होता है, जिससे वह इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन करता है। फॉरेन रिजर्व के घटने और बढ़ने का असर करेंसी की कीमत पर दिखता है। अगर भारत के फॉरेन रिजर्व में डॉलर, अमेरिका के रुपए के भंडार के बराबर होगा तो रुपए की कीमत स्थिर रहेगी। हमारे पास डॉलर घटे तो रुपया कमजोर होगा, बढ़े तो रुपया मजबूत होगा।

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