80 देशों पर रिसर्च के आंकड़ों का एनालिसिस:जेन-जी अपने पेरेंट्स से कम बुद्धिमान, स्क्रीन ने कुंद किया दिमाग

जेन-जी (15 से 27 साल के युवा) पहली ऐसी पीढ़ी बन गए हैं, जिनकी बुद्धि (आईक्यू का स्तर) उनके माता-पिता की पी​ढ़ी से कम है। यह खुलासा न्यूरो साइंटिस्ट डॉ. जैरेड कुनी हॉरवाथ ने अमेरिकी सीनेट की कमेटी में किया। उन्होंने बताया कि डिजिटल टेक्नोलॉजी पर ज्यादा निर्भरता इसकी मुख्य वजह है। डॉ. हॉरवाथ ने कहा कि 1800 के दशक के उत्तरार्ध से पहली बार किसी पीढ़ी का आईक्यू, मेमोरी, ध्यान, पढ़ाई, गणित और समस्या सुलझाने की क्षमता पिछली पीढ़ी से कम हुई है। उन्होंने कहा कि इंसानी दिमाग छोटे वीडियो और संक्षिप्त वाक्यों से सीखने के लिए नहीं बना है। उन्होंने बताया कि इंसान गहराई से पढ़ाई और आमने-सामने बातचीत से बेहतर सीखता है, न कि स्क्रीन से। डॉ. हॉरवाथ ने बताया कि 2010 के बाद से बच्चों की बौद्धिक क्षमता गिरने लगी। कई यूरोपीय देशों के स्कूलों में डिजिटल गैजट्स पर लगाई लगाम स्वीडन जैसे देशों ने हाल ही में स्कूलों में डिजिटल गैजेट्स को हटाकर फिर से कागज-कलम और प्रिंटेड किताबों की ओर लौटने का फैसला किया है। वहीं फ्रांस, नीदरलैंड्स, ब्रिटेन, फिनलैंड जैसे देशों ने भी स्कूलों में टैबलेट और लैपटॉप के इस्तेमाल को भी सीमित कर रही है यूनेस्को की रिपोर्ट में भी चेतावनी दी गई थी कि ‘शिक्षा में तकनीक का अधिक इस्तेमाल तब तक फायदेमंद नहीं है जब तक कि वह सीखने में मदद न करे।’ जेन-जी की कमजोरी उनका अति आत्मविश्वास: विशेषज्ञ डॉ. जैरेड ने कहा कि जेन-जी के युवा अपनी बुद्धिमानी को लेकर जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वासी हैं। उन्हें अपनी कमजोरी का अहसास नहीं है। इसी बीच, शिक्षा विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि बच्चों को स्मार्टफोन देने में देरी की जाए। छोटे बच्चों को जरूरत पड़ने पर फ्लिप फोन दिए जाएं। स्कूलों में टेक्नोलॉजी पर नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कदम उठाए जाएं। विशेषज्ञों ने इसे ‘सामाजिक आपातकाल’ बताया और स्कैंडिनेविया जैसे देशों की तरह ‘एडटेक’ पर रोक लगाने की सिफारिश की। रोज 5 घंटे कंप्यूटर पर बिताने वालों का स्कोर सबसे कम इस रिसर्च में 80 देशों के आंकड़े शामिल हैं। डॉ. जैरेड ने बताया कि पिछले 60 साल में जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी स्कूलों में बढ़ी, बच्चों की सीखने की क्षमता घटी। उन्होंने बताया कि जो बच्चे स्कूल में रोज 5 घंटे कंप्यूटर पर पढ़ाई करते हैं, उनके स्कोर उन बच्चों से कम होते हैं जो टेक्नोलॉजी का कम या बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करते। जब हर छात्र को अलग डिवाइस देने की योजना शुरू हुई, तो स्कोर तेजी से गिरे।

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